मज़दूर या मजबूर

आज हमारे आधार स्तम्भ को पैदल चलते देख मन बहोत दुखी हुआ, असमर्थ हूँ में कुछ नहीं कर पाया उनके लिए जिनके कंधों पर देश का असली बोझ होता है


बिना इनके कुछ नहीं, मज़दूर जिन्हें आज अपने हालात पर छोड़ दिया गया, अगर इन्होंने हमें अपने हाल पर छोड़ दिया तो हम नवाब कुछ नहीं कर पाएँगे


बस इतना ही तो करना था के इन्हें इनके घर सही सलामत भेज देते, और अगर इतना भी न कर पाएँ तो फिर कैसे कहें के हम सक्षम हैं


हमें आज इस महामारी ने इतना लाचार बना दिया के इंसान बेबस हो गया है


जिनके पास पैसा है वो बैठा है अपने घर में और मज़दूर बेचारे भुके पेट चल पड़े हैं मिलों अपने घर के लिए


अब भी वक़्त है कुछ कर सकें तो करलो, जिनके बिना हमें अनाज नहीं मिलता, जिस इमारत में आज बैठे हैं वो नहीं बनती, जिस रास्ते पर चलते हैं वो नहीं बनते


आज एक मौक़ा है उन्हें नमन करने का, ईश्वर को नहीं देखा कभी, चाहो तो पालो अपने ईश्वर को एक मज़दूर में


अब भी वक़्त है कुछ करलो इनके लिए.....।

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